सोमवार 23 फ़रवरी 2026 - 11:29
तुम्हारा एक दिन का तब्लीगी अमल, मेरे सौ दिन के इज्तेहाद से बढ़कर है

हौज़ा / माह ए मुबारक रमज़ान के अय्याम ए तब्लीग़ की मुनासबत से मरहूम आयतुल्लाहिल उज़्मा बुरूजेर्दी के एक अहम बयान को “दीहात में तब्लीग़ करने वाले उलमा के अज्र व सवाब” के हवाले से पेश किया जा रहा है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,माहे ए मुबारक रमज़ान के अय्याम ए तब्लीग़ की मुनासबत से मरहूम आयतुल्लाहिल उज़्मा बुरूजेर्दी के एक अहम बयान को “दीहात में तब्लीग़ करने वाले उलमा के अज्र व सवाब” के हवाले से पेश किया जा रहा है।

मरहूम आयतुल्लाह बुरूजर्दी दरस के दौरान फ़रमाते थे:
मैं तैयार हूँ कि अपनी ज़िंदगी के सौ दिन का सवाब तुम्हें दे दूँ और तुम अपनी ज़िंदगी के एक दिन का सवाब मुझे दे दो!
शागिर्दों ने अर्ज़ किया: “हमारी उम्र का सवाब आपकी बरकत-भरी ज़िंदगी के मुक़ाबले में क्या अहमियत रखता है?

आपने फ़रमाया: “जब मैं अपने घर से मस्जिद-ए-आज़म में तदरीस के लिए आता हूँ तो लोग मुझे सहारा देकर सवार करते हैं, और मैं हज़ार से ज़्यादा फ़ुज़ला और मुज्तहिदीन को दरस देता हूँ, जो मेरी बातों को अच्छी तरह समझते हैं।

लेकिन तुम लोग दूर दराज़ गाँवों में जाते हो, पहाड़ों के पीछे बसे उन लोगों के पास, जो बुनियादी इस्लामी मसाइल से भी वाक़िफ़ नहीं होते। तुम उन्हें उसूल-ए-अक़ाइद और अहकाम-ए-इस्लाम से आशना करते हो, उन्हें राहे-रास्त की हिदायत देते हो, और अक्सर वे तुम्हारी क़द्र भी नहीं जानते।

इसलिए तुम्हारा काम अफ़ज़लुल-आमाल अहमज़ुहा’ (सबसे बेहतरीन अमल वह है जो सबसे ज़्यादा मुश्किल हो) का मिस्दाक़ है।

किताब,मुरूरी बर गुज़र-ए-उमर, ख़ातिरात ज़ैनुल आबिदीन क़ुर्बानी लाहीजी, स.76

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